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Thursday, 18 January 2018

Soil Health Scheme Run By Indian Government In Hindi

क्या आपने मृदा सुधार की इन योजनाओं का लाभ लिया, प्रत्येक किसान इन योजनाओं का लाभ अवश्य लें, क्या करें

मिटटी की जाँच के आधार पर हमेशा उचित मात्र में उर्वरक का उपयोग करें | मिटटी की उपजाऊ क्षमता बरकरार रखने के लिए जैविक खाद का उपयोग करें |उर्वरकों का पूर्ण लाभ पाने हेतु उर्वरक को छिड़कने की बजाय जड़ों के पास डालें |फास्फेटिक उर्वरकों का विवेकपूर्ण और प्रभावी प्रयोग सुनिश्चित करें ताकि जड़ों / तनों का का समुचित विकास हो तथा फसल समय पर पकें , विशेष रूप से फलीदार फसलें , जो मिटटी को उपजाऊ बनाने के लिए वायुमंडलीय नईट्रोजन का उपयोग करती है |सहभागी जैविक गारन्टी व्यवस्था (पी.जी.एस. इंडिया) प्रमाणीकरण अपनाने के इच्छुक किसान अपने आस – पास के गांव में कम से कम पांच किसानों का एक समूह बनाकर इसका पंजीकरण निकटतम जैविक खेती के क्षेत्रीय केन्द्र में करायें |

मृदा स्वास्थ्य कार्ड :
मृदा स्वास्थ्य कार्ड , 19 फ़रवरी 2015 को मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के अंतर्गत शुरू हुई | मृदा स्वास्थ्य कार्ड सभी जोत धारकों को हर दो वर्ष के अंतराल के बाद दिये जाएंगे ताकि वे फसल पैदावार लेने के लिए सिफारिश किए गए पोषक तत्व डालें ताकि मृदा स्वास्थ्य में सुधार हो और भूमि की उपजाऊ शक्ति भी बढ़े |

क्या पायें

मिटटी सुधार के लिए सहायताक्र.स.सहायता का प्रकारसहायता का मापदण्ड / अधिकतम सीमास्कीम / घटक

01.सूक्ष्म तत्वों तथा भूमि सुधार तत्वों का वितरण |रु. 2500 /- प्रति हेक्टेयरमृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना

02.जिप्सम / पाईराइट/ चूना / डोलोमाइट की आपूर्तिलागत का 50% + परिवहन, कुल रु.750 /- प्रति हेक्टेयर तक सीमित |तिलहन एवं आयल पाम राष्ट्रीय मिशन |

 

03.पौध संरक्षण रसायनकीटनाशकों, फफुन्दिनाश्कों, जैव कीटनाशकों, जैव घटकों, सूक्ष्म पोषक तत्वों, जैव उर्वरक आदि लागत के 50% की दर से जो रु. 500 /- प्रति हेक्टेयर तक सीमित |तिलहन एवं आयल पं राष्ट्रीय मिशन

04.जैविक खेती अपनाने के लिए10,000 /- प्रति इकाईराष्ट्रीय बागवानी मिशन / पूर्वोत्तर एवं हिमालय राज्यों के लिए बागवानी मिशन समेकित बागवानी विकास मिशन के अंतर्गत उप योजना

05.वर्मी कम्पोस्ट इकाईरु.50000 /- प्रति इकाई (जिसका परिमाप 30’× 8’×2.5’अथवा अनुपातिक आधार पर 600 क्यूबिक फुट)राष्ट्रीय बागवानी मिशन / पूर्वोत्तर एवं हिमालय राज्यों के लिए बागवानी मिशन | एमआईडीएच की सहायक योजना |

06.अच्छी मोटाई वाली पोलीथिनरु.8000 /- प्रति इकाई (जिसका परिमाप 12’× 4’×2’ अथवा अनुपातिक आधार पर 96 क्यूबिक फुट)राष्ट्रीय बागवानी मिशन / पूर्वोत्तर एवं हिमालय राज्यों के लिए बागवानी मिशन | एमआईडीएच की सहायक योजना |

07.समेकित पोषक तत्व प्रबंधन के लिए प्रोत्साहन1200 /- प्रति हेक्टेयर (4 हेक्टेयर तक)राष्ट्रीय बागवानी मिशन / पूर्वोत्तर एवं हिमालय राज्यों के लिए बागवानी मिशन | एमआईडीएच की सहायक योजना |

08.जिप्सम फस्फोजिप्सम / बेन्टोनाइट सल्फर की आपूर्तिलागत का 50% जो रु. 750 /- प्रति हेक्टेयर तक सीमित |राष्ट्रीय खाद्ध सुरक्षा मिशन (एनएफएसएम) एवं बीजीआरईआई09सुक्ष्मपोषक तत्वलागत का 50% जो रु. 500 /- प्रति हेक्टेयर तक सीमित |राष्ट्रीय खाद्ध सुरक्षा मिशन (एनएफएसएम) एवं बीजीआरईआई

10.चूना / चुनायुक्त सामग्रीसामग्री की लागत का 50% जो रु. 1000 /- प्रति हेक्टेयर तक सीमित |राष्ट्रीय खाद्ध सुरक्षा मिशन (एनएफएसएम) एवं बीजीआरईआई11.जैव उर्वरक (राइजोबियम / पीएसबी)लागत का 50% जो रु. 300 /- प्रति हेक्टेयर तक सीमित |बीजीआरईआई राष्ट्रीय खाद्ध सुरक्षा मिशन (एनएफएसएम)

12.नई मोबाइल / अचल मृदा जाँच प्रयोगशालाओं (एमएसटीएल / एसएसटीएल) की स्थापनाप्रति वर्ष 10,000 नमूनों का विशलेषण करने की क्षमता के लिए नाबार्ड के माध्यम से व्यक्तिगत एवं निजी एजेंसियों के लिए लागत का 33% या तक 25 लाख तक सीमित / प्रयोगशालासत्त कृषि राष्ट्रीय मिशन

13.सूक्ष्म पोषक तत्वों का प्रोत्साहन एवं वितरणलागत का 50% जो रु. 500 /- प्रति इकाई तक सीमित होगा और / अथवा प्रति लाभार्थी रु 1000 /-सतत कृषि राष्ट्रीय मिशन

14.जैव उर्वरक /जैव कीटनाशी आधारित लिकिवड इकाई की स्थापना200 टन प्रति वर्ष उत्पादन क्षमता की पूंजीगत निवेश के रूप में नाबार्ड के जरिए व्यक्तिगत / निजी एजेंसियां के लिए लागत का 25% जो प्रति इकाई रु.40 लाख तक सीमित |सतत कृषि राष्ट्रीय मिशन

15.फल एवं सब्जियों का बाजारी कचरा / कृषि कचरे से कम्पोस्ट उत्पादन इकाई लगाने के लिए3000 टन प्रति वर्ष उत्पादन क्षमता वाले व्यक्तिगत / निजी एजेंसियाँ हेतु नाबार्ड के माध्यम लागत का 33% परंतु प्रति इकाई रु.40 लाख तक सीमितसतत कृषि राष्ट्रीय मिशन

16.किसानों के खेत पर जैविक निविष्ठ (input) को प्रोत्साहन (खाद, वर्मी कम्पोस्ट, जैव उर्वरक, द्रव / ठोस कचरा कम्पोस्ट, हर्बल उद्धरण इत्यादि)लागत का 50% जो रु. 5000 /- प्रति हेक्टेयरऔर रु.10,000 प्रति लाभार्थी तक सीमित होगा | 01 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र कवर करना प्रस्तावित |सतत कृषि राष्ट्रीय मिशन

17.सहभागिता प्रोत्साहन पद्धति प्रमाणीकरण (पीजीएस) के अन्तर्गत समूह बनाकर जैविक खेती को अपनानारु.20000 /- प्रति हेक्टेयर जो 3 वर्ष की अवधि के लिए प्रति लाभार्थी अधिकतम रु. 40,000 /- तक सीमितसतत कृषि राष्ट्रीय मिशन

18.आन – लाइन बनता प्रबंधन और अवशेष विशलेषण के पिजिएसपद्धति को सहायतारु. 200 /- प्रति किसान जो प्रति समूह / वर्ष अधिकतम रु. 5000 /- होगा और प्रति क्षेत्रीय परिषद रु. 1 लाख तक सीमित |

अवशेष परीक्षण के लिए रु. 10,000 /- प्रति नमूना (अवशेष विशलेषण एनबीएल प्रयोगशाला में किया जाएगा) |

सतत कृषि राष्ट्रीय मिशन

19.खाद प्रबंधन और जैविक नत्रजन दोहन के लिए गांव का अंगीकरणसमेकित खाद प्रबंधन का वर्गीकरण, मेड़ों पर उर्वरक पेड़ उगाने ओर समूहों / स्वसहायता समूहों इत्यादि के माध्यम से अन्तर्फसलीय रूप में फलीदार फसलों को प्रोत्साहन के लिए प्रति गांव रु. 10 लाख (प्रतिवर्ष / राज्य अधिकतम 10 गांवों को सहायता दी जाएगी )सतत कृषि राष्ट्रीय मिशन

20.जैविक खेती का प्रदर्शन50 अथवा अधिक प्रतिभागियों के समूह के लिए प्रति प्रदर्शन रु. 20,000 /-सतत कृषि राष्ट्रीय मिशन.

21.समस्या ग्रस्त मृदा का सुधार क्षारीय / लवणीय मिटटी

लागत का 50% जो रु. 25,000 /- प्रति हेक्टेयर तक होगा और / अथवा रु. 50,0000 /- प्रति लाभार्थी तक सीमित |

अम्लीय मृदा

लागत का 50% परन्तु रु.3000 /- प्रति हेक्टेयर और / अथवा रु. 6000 /- रु. प्रति लाभार्थी तक सीमित |

सतत कृषि राष्ट्रीय मिशन

22.आईसीएआर प्रौधोगिकी द्वारा विकसित माईक्रो मृदा परीक्षण प्रयोगशाला स्थापित करनानाबार्ड के माध्यम से प्रति वर्ष 3000 नमूने प्रशिक्षण करने के लिए प्रति व्यक्ति / निजी क्षेत्र के लिए लागत का 44% या रु. 44,000 प्रति लैबसतत कृषि राष्ट्रीय मिशन

23.गांव के स्तर पर मृदा परीक्षण परियोजना की स्थापना करनालागत का 40% या रु. 4,00000 तक जो भी कम हैसतत कृषि राष्ट्रीय मिशन

Thursday, 11 January 2018

Some Websites Relating To Agriculture And Contact List

कृषि सम्बंधित कुछ विशेष वेबसाइट और संपर्क सूची

किसान भारती वेबसाइट http://kisanbharati.com/

टोल फ्री किसान कॉल सेन्टर नंबर 18001801551

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय वेबसाइट http://agricoop.nic.in/

अखिल भारतीय किसान पोर्टल वेबसाइट http://farmer.gov.in/FarmerHome.aspx

एग-मंडी http://agmarknet.gov.in/

बीज जानकारी वेबसाइट http://seednet.gov.in/

खाद बिक्री वेबसाइट http://www.urvarak.co.in/

राष्ट्रिय कृषि विकास योजना वेबसाइट http://rkvy.nic.in/

राष्ट्रिय बागबानी मिशन वेबसाइट http://www.nhm.nic.in/

नेशनल फ़ूड सिक्यूरिटी मिशन http://www.nfsm.gov.in/

कृषि यन्त्र वेबसाइट http://farmech.dac.gov.in/

मोबाइल किसान वेबसाइट http://mkisan.gov.in/

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद वेबसाइट http://www.icar.org.in

एग्रीकल्चर रिसर्च एंड कृषि अनुसन्धान एवम शिक्षा डिपार्टमेंट http://dare.nic.in/

भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद् वेबसाइट http://dwr.org.in/Slider.aspx

भारतीय मौसम विभाग http://www.imd.gov.in

अंदमान निकोबार द्वीप कृषि मंत्रालय वेबसाइट http://agri.and.nic.in

आंध्र प्रदेश कृषि मंत्रालय वेबसाइट http://www.apagrisnet.gov.in

अरुणांचल प्रदेश कृषि मंत्रालय वेबसाइट http://arunachalpradesh.nic.in

आसाम कृषि मंत्रालय वेबसाइट http://www.agriassam.in

बिहार कृषि मंत्रालय वेबसाइट http://krishi.bih.nic.in,

http://krishimis.in

चंडीगढ़ कृषि मंत्रालय वेबसाइट http://agripb.gov.in

छत्तीसगढ़ कृषि मंत्रालय वेबसाइट http://agridept.cg.gov.in

दादरा नागर हवेली कृषि मंत्रालय वेबसाइट http://www.dnh.nic.in/Departments/Agriculture.aspx

दमन दुई कृषि मंत्रालय वेबसाइट  http://www.daman.nic.in/websites/zonal_agriculture_daman/index.asp

दिल्ली कृषि मंत्रालय वेबसाइट http://agricoop.nic.in/

गोवा कृषि मंत्रालय वेबसाइट http://agri.goa.gov.in

गुजरात कृषि मंत्रालय वेबसाइट https://agri.gujarat.gov.in/

हरियाणा कृषि मंत्रालय वेबसाइट http://agriharyana.nic.in/

हिमाचल प्रदेश कृषि मंत्रालय वेबसाइट http://www.hpagriculture.com

जम्मू कश्मीर कृषि मंत्रालय वेबसाइट http://www.jkapd.nic.in

झारखण्ड कृषि मंत्रालय वेबसाइटhttp://www.jharkhand.gov.in/agri

कर्नाटक कृषि मंत्रालय वेबसाइट http://raitamitra.kar.nic.in/KAN/index.asp

केरला कृषि मंत्रालय वेबसाइटhttp://www.keralaagriculture.gov.in/

लक्षद्वीप कृषि मंत्रालय वेबसाइट http://lakagri.nic.in/

मध्य प्रदेश कृषि मंत्रालय वेबसाइट http://mpkrishi.mp.gov.in/

महाराष्ट्र कृषि मंत्रालय वेबसाइटhttp://krishi.maharashtra.gov.in

मणिपुर कृषि मंत्रालय वेबसाइट http://mastec.nic.in/About_agriculture.htm

मेघालय कृषि मंत्रालय वेबसाइट http://www.megagriculture.gov.in

मिजोरम कृषि मंत्रालय वेबसाइटhttp://agriculturemizoram.nic.in

नागालैंड कृषि मंत्रालय वेबसाइट http://agringl.nic.in

ओडिशा कृषि मंत्रालय वेबसाइट http://agriodisha.nic.in

पुद्दुचेरी कृषि मंत्रालय वेबसाइट http://agri.puducherry.gov.in

पंजाब कृषि मंत्रालय वेबसाइट http://agripb.gov.in

राजस्थान कृषि मंत्रालय वेबसाइट http://www.krishi.rajasthan.gov.in, http://agriculture.rajasthan.gov.in

सिक्किम कृषि मंत्रालय वेबसाइट http://www.sikkimagrisnet.org

तमिलनाडु कृषि मंत्रालय वेबसाइट http://www.tn.gov.in/department/2

तेलंगाना कृषि मंत्रालय वेबसाइट http://agrisnet.tg.nic.in

त्रिपुरा कृषि मंत्रालय वेबसाइटhttp://agri.tripura.gov.in

उत्तर प्रदेश कृषि मंत्रालय वेबसाइट http://agriculture.up.nic.in

उत्तराखंड कृषि मंत्रालय वेबसाइट http://agriculture.uk.gov.in

पश्चिम बंगाल कृषि मंत्रालय वेबसाइट http://www.wbagrisnet.gov.in/

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Wednesday, 10 January 2018

Plants Indications Of Micro Nutrients Deficiency In Hindi

"पौधे खुद बताते हैं कि उनको कब क्या चाहिए, जानिए कैसे?"

अधिक उत्पादन के लिए पोषक तत्वों की कमी को पहचान कर उन्हें सही करना प्रत्येक किसान का कर्तव्य होता है। कृषि विभाग, उत्तर प्रदेश की वेबसाइट पर बताया गया है कि किसान फसल के पौधों को देखकर कैसे पहचान सकते हैं कि फसल में किस पोषक तत्व की कमी है, जिससे किसान समय पर उसका उपचार कर सकें।

बोरान
बोरान की कमी से पौधे के सबसे ऊपर की पत्तियां पीली हो जाती हैं। कलियां सफेद या हल्के भूरे मृत ऊतक की तरह दिखाई देती हैं।

गंधक
गंधक की कमी से पत्तियां, शिराओं सहित गहरे हरे से पीले रंग में बदल जाती हैं तथा बाद में सफेद हो जाती हैं। इसकी कमी से सबसे पहले नई पत्तियां प्रभावित होती हैं।

मैगनीज
इसकी कमी से पत्तियों का रंग पीला-धूसर या लाल-धूसर हो जाता है तथा शिराएं हरी होती हैं। पत्तियों का किनारा और शिराओं का मध्य भाग पीला हो जाता है। पीली पत्तियां अपने सामान्य आकार में रहती हैं।

जस्ता
जस्ता की कमी से सामान्य तौर पर पत्तियों के शिराओं के मध्य पीले पन के लक्षण दिखाई देते हैं और पत्तियों का रंग कॉसा की तरह हो जाता है।

मैग्नीशियम
इसकी कमी से पत्तियों के आगे का हिस्सा गहरा हरा होकर शिराओं का मध्यभाग सुनहरा पीला हो जाता है और फिर किनारे से अन्दर की ओर लाल-बैंगनी रंग के धब्बे बन जाते हैं।

फास्फोरस
फास्फोरस की कमी से पौधों की पत्तियां छोटी रह जाती हैं और पौधों का रंग गुलाबी होकर गहरा हरा हो जाता है।

कैल्शियम
कैल्शियम की कमी से पौधे के सबसे ऊपर की पत्तियां प्रभावित होती हैं तथा देर से निकलती हैं। ऊपर की कलियां खराब हो जाती हैं। मक्के की नोचे चिपक जाती हैं।

लोहा
नई पत्तियों में तने के ऊपरी भाग पर सबसे पहले पिलेपन के लक्षण दिखाई देते हैं। शिराओं को छोड़कर पत्तियों का रंग एक साथ पीला हो जाता हैं। ये कमी होने पर भूरे रंग का धब्बा या मृत उतक के लक्षण प्रकट होते हैं।

तांबा
इसकी कमी से नई पत्तियां एक साथ गहरी पीले रंग की हो जती हैं तथा सूख कर गिरने लगती हैं। खाद्यान वाली फसलों में गुच्छों में वृद्धि होती है तथा शीर्ष में दाने नहीं होते हैं।

मालिब्डेनम
इसकी कमी से नई पत्तियां सूख जाती हैं, हल्के हरे रंग की हो जीती हैं, मध्य शिराओं को छोड़ कर पूरी पत्तियों पर सूखे धब्बे दिखाई देते हैं। नाईट्रोजन के उचिट ढंग से उपयोग न होने के कारण पुरानी पत्तियां पीली होने लगती हैं।

पोटैशियम
पोटैशियम की कमी से पुरानी पत्तियों का रंग पीला/भूरा हो जाता है और बाहरी किनारे कट-फट जाते हैं। मौटे आनाज जैसे - मक्का और ज्वार में ये लक्षण पत्तियों के आगे के हिस्से से शुरू होते हैं।

नाइट्रोजन
नाइट्रोजन की कमी से पौधे हल्के हरे रंग के या हल्के पीले रंग के होकर बौने रह जाते हैं। पुराई पत्तियां पहले पीली हो जाती हैं। मोटे अनाज वाली फसलों में पत्तियों का पीलापन आगे के हिस्से से शुरू होकर बीच के हिस्से तक फैल जाता है।

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Tuesday, 2 January 2018

Lauki Ki Unnat Kheti

लौकी की उन्नत खेती

एक बेल पर लगने वाला फल है, जो सब्जी की तरह खाया जाता है। वैकल्पिक नाम 'लउका' या 'कद्दू' है सब्‍जी के रुप में खाए जाने वाली लौकी हमारे शरीर के कई रोगों को दूर करने में सहायक होती है। यह बेल पर पैदा होती है और कुछ ही समय में काफी बड़ी हो जाती है। लौकी एक स्वास्थ्यप्रद सब्जी है जिसकी खेती इस क्षेत्र में परवल की ही तरह प्रमुखता से की जा रही है। गर्मी में तो इसकी खेती विशेष रूप से फायदेमंद है। यही वजह है कि क्षेत्रीय किसान ग्रीष्मकालीन लौकी की खेती बड़े पैमाने पर किए हैं। 

🔴 भूमि- 

इसको बिभिन्न प्रकार की भूमियों में उगाया जा सकता है किन्तु उचित जल धारण क्षमता वाली जीवांशयुक्त हलकी दोमट भूमि इसकी सफल खेती के लिए सर्वोत्तम मानी गई है वैसे उदासीन पी.एच मान वाली भूमि इसके लिए अच्छी रहती है नदियों के किनारे वाली भूमि भी इसकी खेती के लिए उपयुक्त रहती है कुछ अम्लीय भूमि में इसकी खेती की जा सकती है पहली जुताई मिटटी पलटने वाले हल से करें उसके बाद २-३ बार हैरो या कल्टीवेटर चलाएँ |

🔴 जलवायु-

लौकी की खेती के लिए गर्म और आद्र जलवायु की आवश्यकता होती है यह पाले को सहन करने में बिलकुल असमर्थ होती हैइसके लिए 18 से 30 डिग्री सेंटीग्रेट तापक्रम होना चाहिएI इसको गर्म एवम तर दोनों मौसम में उगाया जाता है  उचित बढ़वार के लिए पाले रहित 4 महीने का मौसम अनिवार्य हैI   लौकी की बुवाई गर्मी और वर्षा ऋतु में की जाती है अधिक वर्षा और बादल वाले दिन रोग व कीटों को बढ़ावा देते है |

🔴 प्रजातियाँ-

लौकी के फूलों की आकृति दो प्रकार की होती है यथा लम्बी और गोल आमतौर पर लम्बी और पतली लौकी उगाने के प्रचलन अधिक है इसकी प्रमुख किस्मो की चारित्रिक गुणों का उल्लेख नीचे किया गया है |

पूसा समर प्रोलिफिक लौंग

संकर पूसा मेघदूत

हिसार सेलेक्शन लम्बी 

पंजाब लम्बी 

पंजाब कोमल 

गोल किस्मे 

पूसा समर प्रोलिफिक राउंड

संकर पूसा मंजरी

हिसार सिलेक्शन गोल 

पूसा सन्देश 

नवीनतम किस्मे-

कोयम्बूर 9

अर्का बहार 

पन्त संकर लौकी 1

पूसा संकर 3
नरेंद्र संकर लौकी 4

आजाद नूतन 

🔴 बोने का समय-

ग्रीष्म कालीन फसल के लिए - जनवरी से मार्च

वर्षा कालीन फसल के लिए जून - जुलाई

🔴 पंक्ति से पंक्ति की दूरी- 1.5 मीटर

पौध से पौध की  दूरी 1 मीटर

🔴 बीज की मात्रा-

 जनवरी -मार्च वाली फसल के लिए 4-6किलो ग्राम / हे.

जून- जुलाई वाली फसल के लिए 3-4 किलो ग्रा, / हे.

🔴 बुवाई-

नदियों के किनारे कछारी मिटटी में 1 मीटर. गहरी और 60 से. मि. चौड़ी नालियां बनाई जाती है खुदाई करते समय उपरी आधी बालू का एक और ढेर लगा लिया जाता है आधी बालू को खोदकर उसमे नालियों को लगभग 30 से. मी . तक भर देते है इन्ही नालियों में1.5 मीटर. की दूरी पर छोटे-छोटे थाले बनाकर उनमे बीज बो देते है दो नालियों के मध्य 3 मीटर का फासला रखना चाहिए पौधों को पाले से बचाने के लिए उत्तर पश्चिमी दिशा में टट्टियाँ लगा देनी चाहिए |

🔴 खाद और उर्वरक-

आर्गनिक खाद-
लौकी  की फसल और अधिक पैदावार लेने के लिए उसमे कम्पोस्ट खाद का होना बहुत जरुरी है इसके लिए एक हे. भूमि में लगभग 40-50 क्विंटल गोबर की अच्छे तरीके से सड़ी हुई खाद और 20 किलो ग्राम नीम की खली वजन और 30 किलो अरंडी की खली इन सब खादों को अच्छी तरह मिलाकर अच्छी तरह मिश्रण तैयार कर खेत में बुवाई के पहले इस खाद को समान मात्रा में बिखेर दें और फिर अच्छे तरीके से खेत की जुताई कर खेत को तैयार करें इसके बाद बुवाई करें |

और जब फसल 20-25 दिन की हो जाए तब उसमे नीम का काढ़ा और गौमूत्र लीटर मिलाकर अच्छी तरह मिश्रण तैयार कर फसल में तर-बतर कर छिडकाव करें और हर 10-15 दिन के अंतर पर छिडकाव करें |

 

रासायनिक खाद-
250 से 300 कुन्तल सड़ी गोबर की खाद आखरी जुताई के समय खेत में अच्छी तरह से मिला देना चाहिए इसके साथ ही 80 किलोग्राम नत्रजन, 80 किलोग्राम फास्फोरस एवम 40  किलोग्राम पोटाश तत्व के रूप में देना चाहिएI नत्रजन की आधी मात्रा फास्फोरस एवम पोटाश की पूरी मात्रा खेत की तैयारी के समय तथा नत्रजन की आधी मात्रा दो भागो में  टाप ड्रेसिंग में देना चाहिए पहली बार 3 से 4 पत्तियां पौधे पर आने पर तथा दूसरी बार फूल आने पर नत्रजन देना चाहिएI

🔴 सिचाई एवं खरपतवार नियंत्रण-

जायद में लौकी की खेती के लिए प्रत्येक सप्ताह सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है लेकिन खरीफ अर्थात बरसात में इसके लिए सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है पानी न बरसने पर एवं ग्रीष्म कालीन फसल के लिए 8-10 दिन के अंतर पर सिचाई करें | फसल को खरपतवारों से मुक्त रखना चाहिए फसल में 3-4 बार हलकी निराई- गुड़ाई करें गहरी निराई करने से पौधों की जड़ें कटने का भय रहता है |

🔴 कीट एवं रोग नियंत्रण-

लालड़ी-
पौधों पर दो पत्तियां निकलने पर इस कीट का प्रकोप शुरू हो जाता है यह कीट पत्तियों और फूलों को खाता है इस कीट की सुंडी भूमि के अन्दर पौधों की जड़ों को काटती है |

रोकथाम-
कम से कम 40-50 दिन पुराना 15 लीटर गोमूत्र को तांबे के बर्तन में रखकर 5 किलोग्राम धतूरे की पत्तियों एवं तने के साथ उबालें 7.5 लीटर गोमूत्र शेष रहने पर इसे आग से उतार कर ठंडा करें एवं छान लें मिश्रण तैयार कर 3 ली. को प्रति पम्प के द्वारा फसल में तर-बतर कर छिडकाव करना चाहिए |

फल की मक्खी-
यह मक्खी फलों में प्रवेश कर जाती है और वहीँ पर अंडे देती है अण्डों से सुंडी बाहर निकलती है वह फल को वेकार कर देती है यह मक्खी विशेष रूप से खरीफ वाली फसल को अधिक हानी पहुंचाती है |

रोकथाम-
इम से कम 40-50 दिन पुराना 15 लीटर गोमूत्र को तांबे के बर्तन में रखकर 5 किलोग्राम धतूरे की पत्तियों एवं तने के साथ उबालें 7.5 लीटर गोमूत्र शेष रहने पर इसे आग से उतार कर ठंडा करें एवं छान लें मिश्रण तैयार कर 3 ली. को प्रति पम्प के द्वारा फसल में तर-बतर कर छिडकाव करना चाहिए |

सफ़ेद ग्रब-
यह कीट कद्दू वर्गीय पौधों को काफी क्षति पहुंचाती है यह भूमि के अन्दर रहती है और पौधों की जड़ों को खा जाती है जिसके कारण पौधे सुख जाते है |

रोकथाम-
इसकी रोकथाम के लिए खेत में नीम का खाद प्रयोग करें |

चूर्णी फफूदी-
यह रोग ऐरीसाइफी सिकोरेसिएरम नमक फफूंदी के कारण होता है पत्तियों एवं तनों पर सफ़ेद दरदरा  और गोलाकार जल सा दिखाई देता है जो बाद में आकार में बढ़ जाता है और कत्थई रंग का हो जाता है पूरी पत्तियां पिली पड़कर सुख जाती है पौधों की बढ़वार रुक जाती है |

रोकथाम-
इसकी रोकथाम के लिए देसी गाय का मूत्र 5 लीटर लेकर 15 ग्राम के आकार के बराबर हींग लेकर पिस कर अच्छी तरह मिलाकर घोल बनाना चाहिए प्रति 2 ली. पम्प के द्वारा तर-बतर कर छिडकाव करे ।

मृदु रोमिल फफूंदी-
यह स्यूडोपरोनोस्पोरा क्यूबेन्सिस नामक फफूंदी के कारण होता है रोगी पत्तियों की निचली सतह पर कोणाकार धब्बे बन जाते है जो ऊपर से पीले या लाल भूरे रंग के होते है |

रोकथाम-
इम से कम 40-50 दिन पुराना 15 लीटर गोमूत्र को तांबे के बर्तन में रखकर 5 किलोग्राम धतूरे की पत्तियों एवं तने के साथ उबालें 7.5 लीटर गोमूत्र शेष रहने पर इसे आग से उतार कर ठंडा करें एवं छान लें मिश्रण तैयार कर 3 ली. को प्रति पम्प के द्वारा फसल में तर-बतर कर छिडकाव करना चाहिए |

मोजैक-
यह विषाणु के द्वारा होता है पत्तियों की बढ़वार रुक जाती है और वे मुड़ जाती है फल छोटे बनते है और उपज कम मिलती है यह रोग चैंपा द्वारा फैलता है |

रोकथाम-
इसकी रोकथाम के लिए नीम का काढ़ा या गोमूत्र  तम्बाकू मिलाकर पम्प के द्वारा तर-बतर कर छिडकाव करे ।

एन्थ्रेक्नोज-
यह रोग कोलेटोट्राईकम स्पीसीज के कारण होता है इस रोग के कारण पत्तियों और फलो पर लाल काले धब्बे बन जाते है ये धब्बे बाद में आपस में मिल जाते है यह रोग बीज द्वारा फैलता है |

रोकथाम-
बीज क़ बोने से पूर्व गौमूत्र या कैरोसिन या नीम का तेल के साथ उपचारित करना चाहिए |

🔴 उपज-
यह प्रति हे. जून-जुलाई और जनवरी से मार्च वाली फसलों से 150-200 क्विंटल और 80-100 क्विंटल तक उपज मिल जाती है |

Monday, 1 January 2018

Bambara Farming

*#Bambara* - Vigna subterranea (also known by its common names: Bambara nut, Boro (Yoruba), Bambara groundnut, Bambara-bean, Congo goober, earth pea, ground-bean, or hog-peanut) is a member of the family Fabaceae. The plant originated in West Africa.

Vigna subterranea ripens its pods underground, much like the peanut (also called a groundnut). They can be eaten fresh or boiled after drying.

The origin of the Bambara groundnut is West Africa and the region of cultivation is Sub-Saharan Africa's warm tropics.

Bambara nut grows well any where groundnut (peanut) grows and so is vastly present from Kwara state and throughout the northern parts of Nigeria.

Bambara groundnut represents the third most important grain legume in semi-arid Africa.

“It is resistant to high temperature and is suitable for marginal soils where other leguminous crops cannot be grown”.

In addition, it makes very little demand on the soil and has a high nutritive value with 65% carbohydrate and 18% protein content.

For these reasons it is not prone to the risk of total harvest failure even in low and uncertain rainfall regions.

"Due to its high protein value it is a very important crop for people in Africa Despite its nutritional value, it is still considered as one of the prioritized neglected and underutilized species in Benin.

*#Bambara_groundnut_milk* (BGNM) had been rated higher in acceptability than milk from other legumes like soybean and cowpea.

*#BGNM* can also be fermented with lactic acid bacteria to make a probiotic beverage that not only increase the economic value of the nutritious legume but also help in addressing
malnutrition.

1.) *#Reduces_danger_of_stomach_cancer*

The antioxidant properties of the fatty acids in the Bambara groundnuts have the capacity to suppress the production of carcinogenic substances in the stomach. Hence, it prevents from any damage to the mucus lining of the stomach, it prevents irritation caused to the same due to the carcinogenic substances and hence, it helps in lowering the risk of stomach cancer.

2.) *#Antimicrobial_action*

Bambara groundnut milk is more easily acceptable as compared to the milk from other legumes in its species. It is rich in probiotics. Probiotics are microorganisms, which have been claimed to provide health benefits to the humans and animals. When probiotics are delivered in appropriate amount, extend to a benefit of the health of the recipient. These benefits to the recipients are subduing the development and action of the microbes in infection such as:
1. IBS – irritable bowel syndrome
2. Diarrhea
3. IBD – inflammatory bowel disease.

3.) *#Rich_radix_of_lysine*

The human body cannot produce lysine; hence, it has to be dependent on external supplements of the same. Bambara groundnut is generously gifted with this essential amino acid, which is also a building block of proteins.

4.) *#Lowers_Cholesterol*

Lysine is an essential element helping in proper growth, and plays a very important pin the manufacturing of carnitine.

Carnitine is a nutrient accountable for breaking down of the fatty acids to provide energy to the body, thus it lowers the cholesterol levels in the blood.

5.) *#Maintains_Healthy_Bone*

Lysine also aids in the absorption of calcium for the proper growth of the bones in the body. It helps in the genesis of collagen, which is very essential for connective tissue formation, such as tendon, skin, cartilages and bones.

6.) *#Multi_health_benefits_of_Bambara_protein*

The Bambara groundnut flour is very high in protein. This essential nutrient is used to treat and cure a lot of disorders and diseases in several of the world as a traditional therapeutic treatment.

7.) *#Fights_Kwashiorkor*

Bamabara groundnut plays an important role to provide the protein nourishment in the rural areas of many continents for the children. This helps those children to defeat Kwashiokor

*#Bambara_Medicinal_Parts*

In medicines, seeds (also called nuts) are used for various health and nutritional benefits.

*#Medicinal_Properties*

Bambara groundnut has following healing properties.

Nutritious tonic

Anti-arthritic

Aphrodisiac

Probiotic

Therapeutic Indications

Bambara groundnut is helpful in following health conditions.

Malnutrition

Kwashiorkor

General debility

Chronic Fatigue Syndrome

Physical exhaustion

Insomnia

Low bone mineral density

Cancer

Irritable bowel syndrome & Diarrhea

Heavy or prolonged menstruation

Ulcer

Anemia

Osteoarthritis

*#Optimal_soils* for Bambara groundnut production are *#sandy_soils* to prevent waterlogging optimal soil depth is between 50 and 100 cm, with a light soil texture. soil fertility should be low and soil pH is best suited between 5 and 6.5 and should not be lower than 4.3 or higher than 7.

The production is best suited between a latitude of 20° - 30°, i.e. the tropical wet and dry (Aw) and the subtropical dry summer (Cs) climate zones.

Optimal temperature is between 19 °C and 30 °C.

Temperatures below 16 °C and above 38 °C are not suited for the production of bambara groundnut.

The bambara groundnut is very *#drought_resistant*

The minimal annual rainfall requirement is about 300 mm and optimal annual rainfall is between 750 mm and 1400 mm and should not exceed 3000 mm.

The cropping system is semi-permanent and the Bambara groundnut can be cultivated as single crop or as intercrop.

*#Best_suited_intercrops* are sorghum, millet, maize, groundnut, yams and cassava.

Bambara groundnut is mainly cultivated as intercrop, however the planting density varies between 6 and 29 plants per square meter.

For woodland savannas of Côte d'Ivoire the highest yield is attainable with a plant density of 25 plants per square meter.

Since Vigna subterranea is usually intercropped, no fertilizer is applied. A yield of 1000 kg seed and 925 kg leaves remove 55.7 kg N, 26.2 kg K, 25.1 kg C, 7.8 kg P and 6.6 kg Mg. Since Bambara groundnut is a legume, phosphor is the most important nutrient.

An application rate of 60 kg/ha of P2O5 is recommended for bambara groundnut.

World Production of Bambara in 2015 was 243610tonnes.