हवा लगी पश्चिम की ,
सारे कुप्पा बनकर फूल गए ।
ईस्वी सन तो याद रहा ,
पर अपना संवत्सर भूल गए ।।
चारों तरफ नए साल का ,
ऐसा मचा है हो-हल्ला ।
बेगानी शादी में नाचे ,
जैसे कोई दीवाना अब्दुल्ला ।।
धरती ठिठुर रही सर्दी से ,
घना कुहासा छाया है ।
कैसा ये नववर्ष है ,
जिससे सूरज भी शरमाया है ।।
सूनी है पेड़ों की डालें ,
फूल नहीं हैं उपवन में ।
पर्वत ढके बर्फ से सारे ,
रंग कहां है जीवन में ।।
बाट जोह रही सारी प्रकृति ,
आतुरता से फागुन का ।
जैसे रस्ता देख रही हो ,
सजनी अपने साजन का ।।
अभी ना उल्लासित हो इतने ,
आई अभी बहार नहीं ।
हम अपना नववर्ष मनाएंगे ,
न्यू ईयर हमें स्वीकार नहीं ।।
लिए बहारें आँचल में ,
जब चैत्र प्रतिपदा आएगी ।
फूलों का श्रृंगार करके ,
धरती दुल्हन बन जाएगी ।।
मौसम बड़ा सुहाना होगा ,
दिल सबके खिल जाएँगे ।
झूमेंगी फसलें खेतों में ,
हम गीत खुशी के गाएँगे ।।
उठो खुद को पहचानो ,
यूँ कबतक सोते रहोगे तुम ।
चिन्ह गुलामी के कंधों पर ,
कबतक ढोते रहोगे तुम ।।
अपनी समृद्ध परंपराओं का ,
आओ मिलकर मान बढ़ाएंगे ।
आर्यवृत के वासी हैं हम ,
अब अपना नववर्ष मनाएंगे ।।
🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻
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Tuesday, 2 January 2018
Hindi Poem Against English New Year Celebration
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