Thursday, 3 December 2015

Poem On Dowry / दहेज़ पर एक कविता

कमरे में बैठी थी दुल्हन 
Dowry / दहेज़
Dowry / दहेज़

सज धज कर शरमाई हुई
एक अजनबी से बहुत सी
उम्मीदें थी लगाई हुई....
आईने में खुद को देखती रहती
मन ही मन खुश होती
दुनिया की सारी खुशियाँ थी जैसे 
उसके दर पर आई हुई....
लाल जोड़े में बैठी
हाथों में चूड़ियाँ पहने
चेहरे पर मुश्कान,
आँखे थी काजल से सजाई हुई....
फिर कुछ देर बाद आवाज़ आई
"यह शादी नही हो सकती"
यह सुनकर दुल्हन का दिल टूटा 
और थी वो घबराई हुई....
लड़के के माँ-बाप ने कहा 
"दहेज और चाहिए"
लड़की वालो के बाप ने सोचा
अब बात इज्जत पर है बन आई हुई....
सब कुछ बेच बाच के 
अपनी बिटिया की शादी की
माँ-बाप का दिल था भरा हुआ
और आँखे भी थी भर आई हुई....
बेटी ने पराये घर को अपना घर समझा
दिल से सेवा की
पर हर कदम पर अपनी तमन्नाओ को
थी वो दबाई हुई....
दुल्हन का मोल..एक सोफ़ा, 
एक कार, एक फ्रीज़,एक बिस्तर!!!!
यह कैसी शादी जिसमें
दुल्हन की बोली थी पैसो से लगाई हुई....
हर बात पर बहु को ताने
"क्या दिया तेरे माँ-बाप ने ????"
दुल्हन के ख्वाब, उम्मीदें, खुशियाँ
सब पल भर में परायी हुई....
दुल्हन रोती तड़फती
पर अपने माँ-बाप से कुछ न कहती
इस हाल में क्या इसके पति को भी 
कोई शर्म ना थी आई हुई....
"हिंदुस्तानी" पूछता है सबसे
क्या यह शादी है या सौदे बाज़ी
जहाँ प्यार होना चाहिए 
वहॉ हिसाब-किताब की बातें....
आखिर किसने है ये 
दहेज की आग लगाई हुई....
-----हिंदुस्तानी-----
दोस्तो सभी से विनती है 
दहेज ना दे और ना लें।
आपका एक शेयर 
किसी की ज़िन्दगी बचा सकता है।

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